बिहार में पीड़ित परिवारों को राजभवन बुलवाते सम्राट
जमुई पीड़िता के परिवार से 24 सितंबर को मुख्यमंत्री आवास पर हुई मुलाकात; दूसरी ओर आकाशदीप के घर शादी की बधाई देने पहुंचे, पूर्व CM नीतीश कुमार से उनके आवास पर मिले और पूर्व BJP जिलाध्यक्ष के पिता की श्रद्धांजलि सभा में भी पहुंचे
संपादकीय सार (मुख्य बिंदु)Key Facts
- १.मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने जमुई की नाबालिग पीड़िता और उसके परिवार को मुख्यमंत्री आवास पर बुलाया था।
- २.उन्होंने भोजपुर के भरत तिवारी और सुल्तानगंज के कृष्ण भूषण कुमार के परिवारों से भी मुख्यमंत्री आवास पर मुलाकात की।
- ३.इसके विपरीत, मुख्यमंत्री क्रिकेटर आकाशदीप के घर उनकी शादी की बधाई देने खुद गए थे।
- ४.उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से उनके आवास पर जाकर मुलाकात की और पूर्व BJP जिलाध्यक्ष के पिता की श्रद्धांजलि सभा में भी स्वयं पहुंचे थे।
- ५.यह अंतर मुख्यमंत्री के प्रोटोकॉल और पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदनशीलता पर सवाल उठाता है।

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के हालिया दौरों और मुलाकातों को लेकर अब एक सवाल राजनीतिक और सामाजिक चर्चा में है—जब किसी परिवार के साथ खुशी या राजनीतिक-सामाजिक कार्यक्रम हो, तो मुख्यमंत्री खुद उनके घर पहुंचते हैं, लेकिन गंभीर अपराध के पीड़ित परिवारों से मिलने के लिए उन्हें मुख्यमंत्री आवास क्यों बुलाया जाता है?
यह सवाल खासकर जमुई की नाबालिग पीड़िता के मामले के बाद उठ रहा है। हालांकि इसे मुख्यमंत्री की मंशा पर निष्कर्ष के तौर पर नहीं, बल्कि उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों के बीच दिखाई देने वाले अंतर के रूप में देखना चाहिए।
पीड़ित परिवारों से CM आवास पर मुलाकात
24 सितंबर को जमुई मामले की पीड़िता अपने परिवार के साथ मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से लोक सेवक आवास में मिली। रिपोर्टों के मुताबिक परिवार को मुख्यमंत्री ने खुद बुलाया था। मुलाकात में उन्होंने पीड़िता की सुरक्षा और पढ़ाई को लेकर आश्वासन दिया और मामले में स्पीडी ट्रायल के जरिए एक महीने के भीतर दोषियों को सजा दिलाने की बात कही। पीड़िता की मां ने सरकार और पुलिस की अब तक की कार्रवाई पर संतोष जताया।
इस मुलाकात की तस्वीर मुख्यमंत्री के सोशल मीडिया अकाउंट से भी साझा की गई। इसी तस्वीर को लेकर विपक्ष ने नाबालिग की पहचान सार्वजनिक होने का आरोप लगाते हुए सवाल उठाए हैं। इस आरोप पर अलग से विवाद चल रहा है।
भरत तिवारी का परिवार
भोजपुर के भरत तिवारी की 17 जून 2026 को पुलिस एनकाउंटर में मौत हुई थी। 24 जुलाई को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने उनकी मां आशा देवी समेत परिवार के सदस्यों को 1 अणे मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास पर बुलवा के मुलाकात की।
कृष्ण भूषण कुमार का परिवार
28 अप्रैल, सुल्तानगंज नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी कृष्ण भूषण कुमार की हत्या के बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने उनकी पत्नी शालू कुमारी और अन्य परिजनों से 15 मई 2026 को मुख्यमंत्री आवास पर बुलवा के मुलाकात की। मुख्यमंत्री ने परिवार को सांत्वना दी और सरकारी सहायता का आश्वासन दिया। पत्नी को सरकारी नौकरी देने की बात भी सामने आई।
लेकिन आकाशदीप के घर खुद पहुंचे थे मुख्यमंत्री
इससे पहले जून 2026 में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भारतीय क्रिकेटर आकाशदीप के पैतृक गांव बड्डी, रोहतास पहुंचे थे। वहां उन्होंने आकाशदीप और उनके परिवार से मुलाकात की और उनकी शादी के लिए शुभकामनाएं दी थीं। रिपोर्टों के मुताबिक मुख्यमंत्री करीब 30 से 45 मिनट तक परिवार के साथ रहे और आकाशदीप की मां समेत परिवार के सदस्यों से मुलाकात की।
पूर्व CM नीतीश कुमार से भी उनके आवास पर जाकर मिले
24 सितंबर को ही मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से पटना स्थित उनके आवास पर जाकर मुलाकात की। इसे मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से शिष्टाचार मुलाकात बताया गया। दोनों नेताओं की मुलाकात ऐसे समय हुई है जब बिहार की सत्ता में नेतृत्व परिवर्तन के बाद राजनीतिक समीकरणों को लेकर लगातार चर्चा है।
पूर्व BJP जिलाध्यक्ष के पिता की श्रद्धांजलि सभा में भी पहुंचे
मई 2026 में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी मुंगेर के पूर्व BJP जिलाध्यक्ष के पैतृक आवास पर उनके पिता की श्रद्धांजलि सभा में शामिल हुए थे। रिपोर्ट के मुताबिक मुख्यमंत्री वहां स्वयं पहुंचे और परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की।
यानी निजी खुशी, राजनीतिक शिष्टाचार और पार्टी से जुड़े परिवार के शोक के मौकों पर मुख्यमंत्री के स्वयं संबंधित व्यक्ति के घर/कार्यक्रम स्थल तक जाने के उदाहरण मौजूद हैं ।यानी यहां मुख्यमंत्री ने परिवार को पटना बुलाने के बजाय खुद उनके गांव जाकर मुलाकात की।
यहीं से सवाल उठता है?
एक तरफ मुख्यमंत्री किसी क्रिकेटर के परिवार की खुशी में शामिल होने के लिए उनके पैतृक गांव पहुंचते हैं, पूर्व मुख्यमंत्री से मिलने उनके आवास जाते हैं, और पार्टी के पूर्व पदाधिकारी के परिवार के शोक में उनके घर पहुंचते हैं।
दूसरी तरफ जमुई की नाबालिग पीड़िता और उसके परिवार एवं अन्य पीड़ित परिवारों को मुख्यमंत्री आवास बुलाकर मुलाकात की जाती है। क्या गंभीर अपराध के पीड़ित परिवारों से मिलने के लिए मुख्यमंत्री का खुद उनके गांव जाना संभव नहीं था?
क्या कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में मुख्यमंत्री की मौजूदगी पीड़ित परिवार के बीच जाकर संवेदना व्यक्त करने के रूप में भी दिखाई जा सकती थी? और क्या मुख्यमंत्री की ओर से पीड़ित परिवारों से मिलने के लिए कोई समान प्रोटोकॉल होना चाहिए, चाहे मामला राजनीतिक रूप से कितना भी चर्चित हो?
इन सवालों का पूछा जाना और इनका जवाब मुख्यमंत्री कार्यालय या सरकार की ओर से सामने आना जरूरी है।
यह फर्क क्यों महत्वपूर्ण है?
किसी पीड़ित परिवार के लिए मुख्यमंत्री से मुलाकात केवल प्रशासनिक आश्वासन का मामला नहीं होती। ऐसी मुलाकात का एक प्रतीकात्मक पहलू भी होता है—राज्य की सर्वोच्च कार्यपालिका पीड़ित के साथ खड़ी है।
हालांकि यह भी तथ्य है कि जमुई मामले में परिवार ने मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद सरकार की कार्रवाई पर संतोष जताया है। परिवार की ओर से यह भी कहा गया कि मुख्यमंत्री ने उनकी बेटी की सुरक्षा और पढ़ाई का भरोसा दिया।
इसलिए सवाल सरकार की कार्रवाई हुई या नहीं, इसका नहीं है। सवाल मुख्यमंत्री के सार्वजनिक व्यवहार और प्राथमिकता के दिखाई देने वाले तरीके का है।
बिहार में कानून-व्यवस्था को लेकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी लगातार सख्त कार्रवाई की बात करते रहे हैं। जमुई मामले में भी उन्होंने आरोपियों के खिलाफ तेज कार्रवाई और स्पीडी ट्रायल की बात कही है।
लेकिन अब सवाल यह है—
अगर मुख्यमंत्री खुशी के मौके पर किसी परिवार के घर पहुंच सकते हैं, राजनीतिक शिष्टाचार के लिए पूर्व मुख्यमंत्री के घर जा सकते हैं और पार्टी से जुड़े परिवार के शोक में उनके घर पहुंच सकते हैं, तो क्या किसी अपराध से पीड़ित परिवार के घर जाकर उनका दर्द सुनना भी मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी का हिस्सा नहीं होना चाहिए?
यह तुलना मुख्यमंत्री की मंशा पर फैसला नहीं देती। लेकिन पीड़ित परिवारों से मुलाकात के तरीके में दिखाई देने वाले इस अंतर पर सवाल उठाना जरूर एक वैध सार्वजनिक बहस है।
