पाँच दशक बाद पेरियार
पेरियार केवल इतिहास का एक नाम नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय समाज से पूछे गए उन बुनियादी और अनुत्तरित सवालों का प्रतीक हैं जो आज भी सामाजिक न्याय, समानता और आत्मसम्मान की बहसों के केंद्र में बने हुए हैं।
संपादकीय सार (मुख्य बिंदु)Key Facts
- १.पेरियार का जन्म 17 सितंबर 1879 को तमिलनाडु के ईरोड में हुआ था और वे आत्मसम्मान आंदोलन के संस्थापक थे।
- २.उन्होंने जाति व्यवस्था, धार्मिक रूढ़ियों और सामाजिक असमानता का मुखर विरोध किया, तर्कवाद और आत्मसम्मान पर जोर दिया।
- ३.पेरियार महिला अधिकारों के प्रबल समर्थक थे और उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, संपत्ति और निर्णय लेने की स्वतंत्रता की वकालत की।
- ४.उन्होंने केरल के वैकोम सत्याग्रह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो मंदिर प्रवेश के जातिगत प्रतिबंधों के खिलाफ था।
- ५.पेरियार ने सीधे चुनावी राजनीति में भाग नहीं लिया, बल्कि सामाजिक आंदोलन और विचारों को प्रभावित करने पर ध्यान केंद्रित किया, जिससे द्रविड़ आंदोलन की नींव पड़ी।

17 सितंबर 1879 को तमिलनाडु के ईरोड में एक बच्चे का जन्म हुआ था। नाम था ई.वी. रामासामी। आगे चलकर यही नाम दक्षिण भारत की राजनीति और सामाजिक सुधार की सबसे चर्चित शख्सियतों में शामिल हुआ-पेरियार।
आज उनकी 147वीं जयंती है। पांच दशक से ज्यादा समय पहले उनका निधन हो चुका है। लेकिन तमिलनाडु की राजनीति में पेरियार का नाम आज भी बार-बार आता है। कोई उन्हें सामाजिक न्याय और आत्मसम्मान की लड़ाई का बड़ा चेहरा मानता है, तो कोई उनके धर्म और परंपरा पर तीखे हमलों को लेकर सवाल उठाता है। तो आखिर पेरियार थे कौन? और उनके जाने के इतने साल बाद भी उनकी चर्चा क्यों बनी हुई है?
‘पेरियार’ क्यों कहा गया?
ई.वी. रामासामी एक व्यापारी परिवार से आते थे। शुरुआती जीवन में उन्होंने स्थानीय राजनीति में काम किया और बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े।
1920 के दशक में वह कांग्रेस के आंदोलनों में सक्रिय रहे। लेकिन पार्टी के भीतर जाति और सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़े सवालों को लेकर उनके मतभेद बढ़ते गए। 1925 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और आत्मसम्मान आंदोलन (Self-Respect Movement) शुरू किया। यहीं से पेरियार की सार्वजनिक भूमिका ने एक नया मोड़ लिया और यहीं से उनका नाम पड़ा पेरियार।
पेरियार की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल क्या था?
उनकी राजनीति का एक केंद्रीय सवाल था-समाज में इंसान की हैसियत उसकी जाति से तय क्यों हो?
पेरियार जाति व्यवस्था और सामाजिक ऊंच-नीच के मुखर आलोचक थे। वह धार्मिक रूढ़ियों और उन परंपराओं को भी चुनौती देते थे, जिन्हें वह सामाजिक असमानता को बनाए रखने वाला मानते थे। उनका जोर तर्कवाद, आत्मसम्मान और सामाजिक बराबरी पर था। उनके लिए सामाजिक सुधार सिर्फ कानून बदलने का मामला नहीं था। वह समाज के भीतर मौजूद सत्ता-संबंधों को बदलने की बात करते थे। और यहीं से उनकी भाषा भी काफी आक्रामक और टकराव वाली होती गई।
महिलाओं के सवाल पर भी पेरियार की सोच अपने समय से अलग थी
उनकी पुस्तक ‘Why Was Woman Enslaved?’ में महिलाओं की सामाजिक स्थिति और पितृसत्ता पर उनके विचार विस्तार से सामने आते हैं। पेरियार के लिए महिला मुक्ति का अर्थ केवल महिलाओं के प्रति सम्मान की अपील करना नहीं था, बल्कि उन्हें शिक्षा, संपत्ति, विवाह, परिवार और अपने जीवन से जुड़े निर्णयों में वास्तविक अधिकार देना था।
इसी कारण पेरियार की सामाजिक सुधार की अवधारणा को तीन परस्पर जुड़े आयामों में देखा जा सकता है—आत्मसम्मान, सामाजिक समानता और महिला स्वतंत्रता। उनका मानना था कि जाति-मुक्त और समान समाज का निर्माण महिलाओं की स्वतंत्रता के बिना अधूरा रहेगा।
वैकोम आंदोलन
पेरियार के राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव केरल का वैकोम सत्याग्रह था। यह आंदोलन मंदिर के आसपास की सार्वजनिक सड़कों पर जाति के आधार पर लगाए गए प्रतिबंधों के खिलाफ था। पेरियार ने इसमें हिस्सा लिया और बाद में उन्हें इस आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेताओं में गिना गया। इसी वजह से उन्हें ‘वैकोम वीरर’ यानी वैकोम का वीर भी कहा गया। यह अनुभव उनके सामाजिक सुधार के विचारों को और मजबूत करने वाला बना।
पेरियार धर्म के इतने बड़े आलोचक क्यों बने?
“यदि हमारे पतन का मूल कारण ईश्वर है तो उस ईश्वर को नष्ट करो; यदि धर्म है तो धर्म को नष्ट करो।”— ई. वी. रामासामी पेरियार, यही शायद उनके व्यक्तित्व का सबसे विवादित हिस्सा है। पेरियार धार्मिक आस्था और धार्मिक संस्थाओं की आलोचना सिर्फ व्यक्तिगत विश्वास के स्तर पर नहीं करते थे। उनका तर्क था कि कुछ धार्मिक परंपराएं और सामाजिक व्यवस्थाएं जातिगत असमानता को मजबूत करती हैं। इसलिए उन्होंने तर्कवाद और नास्तिकता को सामाजिक सुधार के औजार के रूप में प्रस्तुत किया। उनके भाषणों और आंदोलनों में धार्मिक प्रतीकों की आलोचना और विरोध के कई तीखे उदाहरण मिलते हैं। इसी वजह से उनके समर्थकों के लिए वह अंधविश्वास और सामाजिक पदानुक्रम के खिलाफ आवाज बने, जबकि आलोचकों के लिए उनके तरीके और भाषा विवाद का विषय रहे हैं। यानी पेरियार को समझने के लिए सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं है कि वह ‘सामाजिक सुधारक’ थे। यह भी समझना जरूरी है कि वह सुधार के लिए किस टकराव वाले रास्ते को सही मानते थे।
और यहीं से निकला आत्मसम्मान आंदोलन (Self-Respect Movement)
“मनुष्य को अपने सम्मान और गरिमा को अपने जीवन जितना ही मूल्यवान समझना चाहिए।”— ई. वी. रामासामी पेरियार, इन्हीं विचारों के साथ 1925 में शुरू हुआ Self-Respect Movement पेरियार की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक पहलों में से एक था। इसका जोर जाति-विरोध, आत्मसम्मान, तर्कवाद और सामाजिक बराबरी पर था। आंदोलन ने विवाह, जाति पहचान, महिलाओं के अधिकार और धार्मिक रूढ़ियों जैसे सवालों को सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनाया। बाद में यही विचारधारा तमिलनाडु की राजनीति में बड़े पैमाने पर प्रभाव डालने वाली दलित आंदोलन (Dravidian movement) की बुनियाद का हिस्सा बनी।
पेरियार चुनावी राजनीति में क्यों नहीं गए?
यह बात भी दिलचस्प है कि पेरियार ने अपना अधिकांश जीवन चुनाव जीतने या सरकार चलाने की बजाय सामाजिक आंदोलन और विचारों को प्रभावित करने में लगाया। जिसका परिणाम यह हुआ कि 1944 में Justice Party और Self-Respect movement से जुड़े संगठनों के पुनर्गठन के बाद Dravidar Kazhagam (DK) बना। इसके बाद पेरियार ने सीधे चुनावी राजनीति की बजाय आंदोलनकारी राजनीति पर जोर बनाए रखा। सी.एन. अन्नादुरै समेत उनके कई सहयोगी बाद में अलग होकर चुनावी राजनीति में गए और 1949 में Dravida Munnetra Kazhagam (DMK) का गठन हुआ। यहीं से पेरियार के विचार और तमिलनाडु की चुनावी राजनीति दो अलग रास्तों पर चलते हुए भी एक-दूसरे से जुड़े रहे।
आज भी पेरियार का नाम राजनीति में क्यों आता है?
क्योंकि तमिलनाडु की राजनीति और सामाजिक नीति पर उनके विचारों का प्रभाव लंबे समय तक बना रहा। सामाजिक न्याय, आरक्षण, जाति-आधारित असमानता, भाषा और क्षेत्रीय पहचान जैसे सवालों पर होने वाली बहसों में पेरियार का संदर्भ बार-बार सामने आता है। आज तमिलनाडु की अलग-अलग राजनीतिक धाराएं भी पेरियार की विरासत का अपने-अपने तरीके से उल्लेख करती हैं। Times of India की आज की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य की राजनीति में अलग-अलग दल पेरियार के नाम और विचारों को अलग-अलग संदर्भों में इस्तेमाल करते हैं। यानी पेरियार की विरासत सिर्फ एक संगठन या एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं रह गई।
आज की तारीख में पेरियार क्यों प्रासंगिक हैं?
क्योंकि जिन सवालों को उन्होंने उठाया था, उनमें से कई आज भी भारतीय समाज की बहस का हिस्सा हैं।
जाति के आधार पर भेदभाव?
सामाजिक प्रतिनिधित्व?
महिलाओं की बराबरी?
धर्म और तर्क के बीच संबंध?
भाषा और क्षेत्रीय पहचान?
और सबसे बड़ा सवाल - क्या किसी इंसान की सामाजिक हैसियत जन्म से तय होनी चाहिए?
पेरियार इन सवालों के जवाब बेहद तीखे तरीके से देते थे। उनके तरीके से सहमत होना जरूरी नहीं है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि उन्होंने इन सवालों को सार्वजनिक राजनीति के केंद्र में कैसे पहुंचाया। तमिलनाडु सरकार ने 2021 में 17 सितंबर को ‘Social Justice Day’ के रूप में मनाने की घोषणा की थी। और आज, उनकी 147वीं जयंती पर, पेरियार सिर्फ इतिहास की किताब में दर्ज एक नाम नहीं हैं। वह आज भी एक बहस हैं। एक ऐसी बहस जिसमें सवाल सिर्फ यह नहीं है कि “पेरियार कौन थे?”
सवाल यह भी है-“उनके उठाए हुए सवालों में से कितने सवाल आज भी हमारे सामने खड़े हैं?”
हमारी नजर से शायद पेरियार को समझने का सबसे सीधा रास्ता यही है: उनके नाम पर सहमत या असहमत होने से पहले यह देखिए कि उन्होंने भारतीय समाज से कौन-कौन से सवाल पूछे थे, और उनमें से कौन से सवाल आज भी अनुत्तरित हैं।
