‘वोट चोरी’ से ‘संस्था चोरी’ तक: राहुल गांधी ने CEC ज्ञानेश कुमार से मांगा इस्तीफा, चुनाव आयोग पर फिर उठाए सवाल
24 सितंबर को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राहुल गांधी ने दावा किया कि चुनावी व्यवस्था में गड़बड़ी के उनके पुराने आरोपों को अब चुनाव आयोग के भीतर दर्ज असहमति से बल मिलता है। CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की और पूछा, अगर भारत में हर सरकार को एंटी-इनकम्बेंसी झेलनी पड़ती है, तो BJP इससे कैसे बच रही है?
संपादकीय सार (मुख्य बिंदु)Key Facts
- १.राहुल गांधी ने 24 सितंबर को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर CEC ज्ञानेश कुमार से इस्तीफे की मांग की।
- २.उन्होंने अपने 'वोट चोरी' के आरोप को 'संस्था चोरी' तक बढ़ाया।
- ३.विवाद की जड़ इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट है, जिसमें चुनाव आयुक्तों की SIR पर 14 आपत्तियां दर्ज होने की बात कही गई है।
- ४.राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह पर भी आरोप लगाए और उन्हें 'देशद्रोही' कहा।
- ५.चुनाव आयोग और बीजेपी ने राहुल के आरोपों को खारिज करते हुए आंतरिक असहमति को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बताया है।

राहुल गांधी ने गुरुवार, 24 सितंबर को नई दिल्ली के इंदिरा भवन में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर एक बार फिर गंभीर आरोप लगाए। इस बार राहुल की प्रेस कॉन्फ्रेंस की पृष्ठभूमि चुनाव आयोग के भीतर Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर सामने आई असहमति है।
राहुल गांधी ने अपने पुराने ‘वोट चोरी’ के आरोप को आगे बढ़ाते हुए इसे “वोट चोरी, कानून चोरी और संस्था चोरी” की कड़ी बताया। उन्होंने दावा किया कि 2024 लोकसभा चुनाव समेत अलग-अलग विधानसभा चुनावों में गड़बड़ी हुई है और कांग्रेस के पास अपने आरोपों के समर्थन में पर्याप्त जानकारी है। ये राहुल गांधी और कांग्रेस के आरोप हैं; चुनाव आयोग पूर्व में उनके चुनावी हेरफेर संबंधी आरोपों को खारिज करता रहा है।
इस बार विवाद की जड़ चुनाव आयोग के अंदर से आई खबर है
राहुल गांधी की नई प्रेस कॉन्फ्रेंस को समझने के लिए पहले उस रिपोर्ट को समझना जरूरी है जिसके बाद यह विवाद तेज हुआ।
Indian Express की जांच के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर SIR और मतदाता सूची से जुड़े कुछ फैसलों पर रिकॉर्ड में आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में बिना जानकारी के फैसले लेने, नए मतदाताओं के लिए Form 6 में बदलाव, मतदाताओं के नाम हटाने और वापस जोड़ने तथा voter database के केंद्रीकरण और उसकी custody जैसे विषय शामिल बताए गए हैं।
इसी बिंदु को राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस का बड़ा आधार बनाया। उनका तर्क था कि अब सवाल सिर्फ विपक्ष नहीं उठा रहा, बल्कि चुनाव आयोग के दो आयुक्तों की दर्ज आपत्तियां भी सामने आई हैं। हालांकि इन आंतरिक मतभेदों का होना अपने-आप राहुल गांधी के चुनावी धांधली के व्यापक आरोपों को सिद्ध नहीं करता। BJP ने इससे उलट कहा है कि आयुक्तों के बीच विचार-विमर्श और असहमति संवैधानिक संस्था के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का संकेत है और अंततः SIR के फैसले सहमति से हुए।
राहुल ने CEC ज्ञानेश कुमार पर क्या आरोप लगाए?
राहुल गांधी के निशाने पर इस बार पूरा चुनाव आयोग होने के साथ खास तौर पर CEC ज्ञानेश कुमार रहे। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस संस्था की जिम्मेदारी नागरिकों के वोट की रक्षा करना है, उसी व्यवस्था में वोट सुरक्षित नहीं रहा। उन्होंने इसे संविधान और देश की कानूनी व्यवस्था पर हमला बताया और ज्ञानेश कुमार से तत्काल इस्तीफा देने की मांग की।
राहुल इससे भी आगे गए। उन्होंने ज्ञानेश कुमार को सुझाव दिया कि उन्हें इस मामले में “approver” यानी सरकारी गवाह बन जाना चाहिए। राहुल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर भी आरोप लगाए और दावा किया कि भविष्य में उनके खिलाफ जांच होगी। ये आरोप राहुल गांधी के राजनीतिक दावे हैं, किसी अदालत या जांच एजेंसी द्वारा स्थापित निष्कर्ष नहीं।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल ने मोदी, शाह और ज्ञानेश कुमार के लिए बेहद गंभीर राजनीतिक शब्दावली का इस्तेमाल किया और वोट पर हमला करने वालों को ‘देशद्रोही’ कहा। फ़ॉक्स हिन्दी इन आरोपों को राहुल गांधी के बयान के रूप में ही रिपोर्ट कर रहा है; इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
राहुल गांधी ने कौन से सवाल उठाए?
राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में मोटे तौर पर चार सवाल उभरकर सामने आए।
पहला- अगर चुनाव आयोग वोट का संस्थागत संरक्षक है, तो मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब कौन देगा?
दूसरा- अगर चुनाव आयोग के दो अन्य आयुक्तों ने कई बार प्रक्रियाओं पर आपत्ति दर्ज की थी, तो उन आपत्तियों के बावजूद फैसले कैसे और किस स्तर पर लिए गए? उपलब्ध जांच रिपोर्ट में कम से कम 14 दर्ज आपत्तियों का उल्लेख है।
तीसरा सवाल राहुल ने भारतीय राजनीति की anti-incumbency को लेकर उठाया। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का उदाहरण देते हुए तर्क दिया कि भारत में लोकप्रिय सरकारों और नेताओं को भी समय के साथ सत्ता-विरोधी माहौल का सामना करना पड़ता रहा है। फिर उन्होंने सवाल उठाया कि उनके मुताबिक नरेंद्र मोदी, अमित शाह और BJP के मामले में वही राजनीतिक ताकत क्यों दिखाई नहीं देती। यह राहुल का राजनीतिक तर्क है, चुनावी हेरफेर का स्वतंत्र प्रमाण नहीं।
चौथा और सबसे बड़ा सवाल राहुल ने चुनावों की विश्वसनीयता पर उठाया। उन्होंने दावा किया कि उनके पास इतनी जानकारी है कि वे 2024 लोकसभा और विधानसभा चुनावों में ‘rigging’ होने की बात “100 प्रतिशत certainty” से कह सकते हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने अतीत में राहुल के ‘वोट चोरी’ संबंधी आरोपों को गलत और आधारहीन बताया है तथा कहा है कि मतदाता का नाम निर्धारित प्रक्रिया और संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिए बिना नहीं हटाया जा सकता।
‘वोट से संविधान और संविधान से संस्थाएं’: राहुल का तर्क
राहुल गांधी ने अपनी बात को एक श्रृंखला के रूप में रखा। उनका कहना था कि चुनाव आयोग वोट की रक्षा करता है, वोट से संविधान को लोकतांत्रिक शक्ति मिलती है, संविधान से कानून और कानूनों से संस्थाएं संचालित होती हैं। इसलिए उनके मुताबिक वोट की विश्वसनीयता प्रभावित होने पर इसका असर पूरी संवैधानिक व्यवस्था तक जाता है। इसी तर्क को उन्होंने ‘वोट चोरी’ से ‘कानून चोरी’ और फिर ‘संस्था चोरी’ तक पहुंचाया।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस इस मुद्दे पर चुप नहीं बैठेगी और पार्टी ने स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका निभाई है, इसलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े सवाल उठाती रहेगी।
लेकिन चुनाव आयोग का पक्ष भी समझना जरूरी
राहुल गांधी लंबे समय से मतदाता सूचियों और चुनाव प्रक्रिया को लेकर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाते रहे हैं। चुनाव आयोग ने उनके पहले के आरोपों को खारिज किया है। सितंबर 2025 में राहुल द्वारा मतदाता नाम हटाए जाने को लेकर लगाए गए आरोपों के जवाब में ECI ने कहा था कि कोई आम व्यक्ति ऑनलाइन किसी मतदाता का नाम सीधे नहीं हटा सकता और नाम हटाने से पहले संबंधित व्यक्ति को प्रक्रिया के तहत सुनवाई का अवसर दिया जाता है।
मौजूदा SIR विवाद में BJP का कहना है कि चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति सामने आना यह साबित नहीं करता कि प्रक्रिया गलत थी। पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने 23 सितंबर को कहा कि संवैधानिक संस्था के भीतर नोट लिखे जाना, आपत्तियां उठना और चर्चा होना स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
यानी फिलहाल दो अलग दावे आमने-सामने हैं। राहुल गांधी आंतरिक आपत्तियों को चुनावी व्यवस्था पर अपने पुराने सवालों से जोड़ रहे हैं, जबकि BJP इन मतभेदों को सामान्य संस्थागत deliberation बता रही है। उपलब्ध रिकॉर्ड में दो चुनाव आयुक्तों की कम से कम 14 आपत्तियां रिपोर्ट हुई हैं, लेकिन इससे राहुल गांधी का यह व्यापक दावा अपने-आप प्रमाणित नहीं होता कि सभी चुनावों में धांधली हुई।
अब मामला कहां खड़ा है?
चुनाव आयोग के भीतर दर्ज असहमति सामने आने के बाद विपक्ष का दबाव CEC ज्ञानेश कुमार पर केंद्रित हो गया है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने CEC को हटाने, SIR रोकने और चुनाव आयोग के कामकाज की Supreme Court की निगरानी में स्वतंत्र जांच जैसी मांगें उठाई हैं।
राहुल गांधी की 24 सितंबर की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने इसी विवाद को एक कदम आगे बढ़ाया है। अब बहस सिर्फ ‘वोट चोरी’ के पुराने आरोपों तक सीमित नहीं है। नया सवाल यह है कि चुनाव आयोग के भीतर दर्ज असहमतियां वास्तव में किन फैसलों को लेकर थीं, उन पर अंतिम निर्णय कैसे हुआ और आयोग इस पूरे रिकॉर्ड को सार्वजनिक तौर पर किस तरह स्पष्ट करता है।
