फिर से टाटा के बोर्डरूम टकराव, चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर ट्रस्ट ने उठाए सवाल
टाटा ट्रस्ट्स ने टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति पर सवाल उठाए हैं। बोर्ड वोट और नियुक्ति की वैधता को लेकर विवाद बढ़ा है।
संपादकीय सार (मुख्य बिंदु)Key Facts
- १.टाटा ट्रस्ट्स ने एन. चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति की वैधता पर सवाल उठाया है।
- २.ट्रस्ट्स के अनुसार, बोर्ड बैठक में प्रस्ताव को आवश्यक समर्थन नहीं मिला।
- ३.नोएल टाटा, जो टाटा ट्रस्ट्स के नामित निदेशक हैं, ने प्रस्ताव का विरोध किया।
- ४.विवाद कंपनी के Articles of Association में चेयरमैन की नियुक्ति से संबंधित शर्तों की व्याख्या पर केंद्रित है।
- ५.ट्रस्ट्स ने अपने रुख के समर्थन में 2016 के साइरस मिस्त्री मामले का भी हवाला दिया है।

टाटा समूह के भीतर नेतृत्व को लेकर एक बार फिर विवाद सामने आया है। Tata Trusts ने Tata Sons के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन को एक और कार्यकाल देने के बोर्ड के फैसले की वैधता पर सवाल उठाया है। ट्रस्ट्स का कहना है कि 17 सितंबर को हुई बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के प्रस्ताव को जरूरी समर्थन नहीं मिला था।
Tata Sons के बोर्ड ने 17 सितंबर को चंद्रशेखरन को पांच साल के एक और कार्यकाल के लिए चेयरमैन बनाए रखने के पक्ष में मतदान किया था। कुल मिलाकर प्रस्ताव के पक्ष में 4 वोट पड़े, जबकि Tata Trusts के चेयरमैन और बोर्ड में ट्रस्ट्स के नामित निदेशक नोएल टाटा ने इसका विरोध किया। इसके बाद ट्रस्ट्स ने कहा कि केवल कुल बोर्ड वोटों की संख्या से प्रस्ताव को वैध नहीं माना जा सकता।
विवाद की जड़ क्या है?
Tata Trusts के मुताबिक, Tata Sons के Articles of Association यानी कंपनी के आंतरिक नियमों में चेयरमैन की नियुक्ति के लिए ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों के समर्थन की अलग शर्त है। ट्रस्ट्स का दावा है कि उसके दो नामित निदेशकों में से एक ने प्रस्ताव का विरोध किया, इसलिए जरूरी समर्थन पूरा नहीं हुआ। इसी आधार पर उसने प्रस्ताव को कानूनी प्रभाव से रहित बताया है।
ट्रस्ट्स ने यह भी कहा है कि चेयरमैन का निर्णायक मत इस कमी को दूर नहीं कर सकता। उसके मुताबिक casting vote का इस्तेमाल तभी हो सकता है जब पूरे बोर्ड के स्तर पर बराबर वोट पड़ें। यह अलग से जरूरी ट्रस्ट-नॉमिनी समर्थन की शर्त को खत्म नहीं करता।
चंद्रशेखरन की विदाई से वापसी तक
यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अगस्त में चंद्रशेखरन ने मौजूदा कार्यकाल खत्म होने के बाद दोबारा नियुक्ति की पेशकश न करने का फैसला सार्वजनिक किया था। Tata Trusts का कहना है कि उसने उस फैसले को स्वीकार कर लिया था और उत्तराधिकारी चुनने की प्रक्रिया शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ाए थे। 17 सितंबर का बोर्ड फैसला इसी प्रक्रिया में बदलाव लेकर आया।
अब विवाद आगे बढ़ने पर कंपनी के Articles of Association की व्याख्या और बोर्ड में ट्रस्ट्स के अधिकार अहम हो सकते हैं। Tata Trusts ने अपने रुख के समर्थन में 2016 के साइरस मिस्त्री मामले से जुड़े कानूनी विवाद का भी हवाला दिया है।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि विवाद का अंतिम समाधान किस स्तर पर होगा। अगला महत्वपूर्ण पड़ाव Tata Sons की आगामी AGM और चंद्रशेखरन के निदेशक पद से जुड़े अनुमोदन की प्रक्रिया हो सकती है।
