SEMICON India 2026: भारत की चिप दौड़ में इस बार क्या दांव पर है?
15 जुलाई 2026 को केंद्र सरकार ने सेमीकॉन 2.0 को मंजूरी दी। इसके लिए 1,27,500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है
मुख्य बिंदु (Key Facts) संपादकीय सार
- १. SEMICON India 2026, 17 से 19 सितंबर तक नई दिल्ली के यशोभूमि में आयोजित हो रहा है।
- २. केंद्र सरकार ने 15 जुलाई 2026 को सेमीकॉन 2.0 को मंजूरी दी, जिसके लिए ₹1,27,500 करोड़ का प्रावधान है।
- ३. सेमीकॉन 1.0 के तहत स्वीकृत 12 परियोजनाओं में से पांच में वाणिज्यिक उत्पादन शुरू हो चुका है।
- ४. सेमीकॉन 2.0 का लक्ष्य चिप डिजाइन, मशीनरी, सामग्री, उन्नत पैकेजिंग और कुशल कार्यबल तैयार करना है।
- ५. टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स गुजरात के धोलेरा में लगभग 10 अरब डॉलर की फैब परियोजना स्थापित कर रही है।
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क्या भारत में चिप बनाने की कहानी अब सिर्फ सरकारी घोषणाओं और बड़ी-बड़ी योजनाओं तक नहीं रह गई है? 17 सितंबर से नई दिल्ली के यशोभूमि में SEMICON India 2026 शुरू हुआ है और 19 सितंबर तक चलने वाले इस आयोजन में दुनिया भर की सेमीकंडक्टर कंपनियां, निवेशक, शोधकर्ता और भारत की कंपनियां जुटी हैं। इस बार आयोजन की खास बात यह है कि भारत सरकार जिस सेमीकंडक्टर उद्योग की नींव रखने की बात पिछले कुछ सालों से कर रही थी, उसमें अब उत्पादन शुरू होने की तस्वीर भी दिखाई देने लगी है। सरकार के मुताबिक सेमीकॉन 1.0 के तहत मंजूर 12 परियोजनाओं में से पांच में वाणिज्यिक उत्पादन शुरू हो चुका है।
लेकिन चिप की दुनिया में पांच कारखानों का उत्पादन शुरू होना मंजिल नहीं है। असली सवाल इससे कहीं बड़ा है-क्या भारत सिर्फ कुछ चिप परियोजनाएं शुरू कर पाएगा, या फिर चिप बनाने से लेकर उसकी पैकिंग, मशीन, जरूरी रसायन, डिजाइन, शोध और कुशल लोगों तक पूरी व्यवस्था अपने यहां खड़ी कर पाएगा? SEMICON India 2026 में इस बार इसी बड़े सवाल का जवाब तलाशा जा रहा है।
आखिर चिप के पीछे इतनी भागदौड़ क्यों है?
आज का शायद ही कोई बड़ा इलेक्ट्रॉनिक सामान हो जिसमें सेमीकंडक्टर न लगा हो। मोबाइल फोन से लेकर कार तक, दूरसंचार उपकरण से लेकर बिजली के सामान तक और रक्षा उपकरणों से लेकर डेटा केंद्रों तक-हर जगह चिप की जरूरत है। अब AI का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, इसलिए ज्यादा ताकतवर चिप की मांग भी बढ़ रही है। यही वजह है कि सेमीकंडक्टर अब सिर्फ तकनीक का मामला नहीं रह गया। यह उद्योग, व्यापार, रक्षा और देश की आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ गया है।
भारत की मुश्किल यह रही है कि देश में चिप डिजाइन करने वाले इंजीनियर और कंपनियां लंबे समय से मौजूद हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर चिप बनाने की उतनी क्षमता मजबूत नहीं रही। दुनिया में ताइवान, दक्षिण कोरिया, चीन, जापान और अमेरिका जैसे देशों ने इस क्षेत्र में कई साल पहले बढ़त बना ली थी। अब भारत उस दौड़ में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।
भारत में अब तक
भारत सरकार ने दिसंबर 2021 में ₹76,000 करोड़ की लागत के बाद सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम शुरू किया था, ऐसा PIB की 17 सितम्बर 2026 को आई प्रेस रिलीज़ कहती है । इसके तहत चिप बनाने वाली फैक्ट्रियों और चिप की पैकिंग जैसी परियोजनाओं के लिए सरकारी सहायता का रास्ता खोला गया। सरकार की मानें तो इस कार्यक्रम के तहत अब तक 1.64 लाख करोड़ रुपये के कुल निवेश वाली 12 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इनमें से पांच परियोजनाओं में वाणिज्यिक उत्पादन शुरू हो चुका है।
यहां एक फर्क समझना जरूरी है। किसी परियोजना को मंजूरी मिलना और वहां बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू हो जाना दो अलग-अलग बातें हैं। चिप बनाने वाली फैक्ट्री खड़ी करने में बहुत पैसा और समय लगता है। इसके लिए बेहद साफ वातावरण, लगातार बिजली, बड़ी मात्रा में शुद्ध पानी, महंगी मशीनें, खास रसायन और प्रशिक्षित लोगों की जरूरत होती है। इसके बाद भी फैक्ट्री तैयार हो जाने भर से काम पूरा नहीं होता। वहां से निकलने वाली चिप को लगातार अच्छी गुणवत्ता के साथ बनाना और बाजार तक पहुंचाना अगली चुनौती होती है।
सेमीकॉन 2.0
15 जुलाई 2026 को केंद्र सरकार ने सेमीकॉन 2.0 को मंजूरी दी। इसके लिए 1,27,500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। पहली योजना में जहां मुख्य जोर चिप बनाने वाली फैक्ट्रियों और पैकिंग इकाइयों पर था, वहीं दूसरी योजना का दायरा काफी बड़ा रखा गया है। इसमें चिप डिजाइन, मशीन और सामग्री, नई फैक्ट्रियां, उन्नत पैकेजिंग, शोध और कुशल लोगों को तैयार करने पर जोर है।
यानी सरकार अब सिर्फ यह नहीं चाहती कि भारत में कोई कंपनी चिप बनाए। कोशिश यह है कि चिप बनने की पूरी प्रक्रिया में भारत की हिस्सेदारी बढ़े। चिप डिजाइन करने से लेकर उसे बनाने, जांचने, पैक करने और इसके लिए जरूरी मशीन और सामग्री तैयार करने तक देश में ज्यादा काम हो। यही बदलाव इस बार के SEMICON India की कहानी का सबसे अहम हिस्सा है।
एक लाख करोड़ रुपये का निवेश
17 सितंबर को केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि सेमीकॉन 2.0 के तहत करीब 11 से 12 अरब डॉलर यानी लगभग एक लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव सामने आए हैं। ये प्रस्ताव चिप बनाने वाली इकाइयों के साथ-साथ मशीन, सामग्री, गैस और रसायन जैसे क्षेत्रों से जुड़े हैं। सरकार के मुताबिक इनमें से कई प्रस्ताव अगले दो-तीन वर्षों में जमीन पर उतर सकते हैं। लेकिन यहां भी शब्दों का फर्क समझना जरूरी है। ये निवेश प्रस्ताव हैं, पूरा पैसा अभी भारत में लग नहीं चुका है। कई कंपनियों को अपने निदेशक मंडल और शेयरधारकों से मंजूरी लेनी बाकी है। इसलिए इस आंकड़े को भारत में हो चुका निवेश मानना सही नहीं होगा। फिर भी इसका मतलब यह जरूर है कि सेमीकंडक्टर की पूरी कड़ी में काम करने वाली कंपनियां भारत में अपनी जगह बनाने में रुचि दिखा रही हैं।
Applied Materials ने 5 अरब डॉलर लगाए?
SEMICON India 2026 के शुरू होते ही अमेरिकी कंपनी Applied Materials ने भारत में अगले दस साल में 5 अरब डॉलर निवेश करने की योजना का ऐलान किया। कंपनी चिप बनाने वाली फैक्ट्रियों के लिए जरूरी मशीन और तकनीक उपलब्ध कराने वाली दुनिया की बड़ी कंपनियों में से एक है। भारत में उसका प्रस्ताव शोध, आपूर्ति व्यवस्था और लोगों को प्रशिक्षित करने से जुड़े कामों पर केंद्रित होगा। इस ऐलान की अहमियत सिर्फ 5 अरब डॉलर की रकम में नहीं है। चिप बनाने के लिए सिर्फ एक फैक्ट्री काफी नहीं होती। उस फैक्ट्री के आसपास मशीन बनाने वाली कंपनियां, रसायन और दूसरी सामग्री देने वाले उद्योग, शोध केंद्र और प्रशिक्षित कर्मचारी भी चाहिए होते हैं। अगर ये सारी कड़ियां एक साथ मजबूत होती हैं तो भारत में चिप उद्योग की जड़ें गहरी हो सकती हैं। Applied Materials का निवेश इसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा है।
टाटा की चिप फैक्ट्री महत्वपूर्ण क्यों?
भारत की सेमीकंडक्टर कहानी में गुजरात के धोलेरा में बन रही टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स की फैक्ट्री को खास जगह मिली है। यह करीब 10 अरब डॉलर की परियोजना है और यहां सिलिकॉन की चादर यानी वेफर पर चिप बनाने की कोशिश हो रही है। ऐसी फैक्ट्री को आम तौर पर फैब कहा जाता है। लेकिन इस परियोजना के सामने देरी की चुनौती भी रही है। Reuters के मुताबिक धोलेरा की फैक्ट्री में हो रहा काम पहले से तय समय से करीब दो साल पीछे चला गया है। भारत के लिए यह एक अहम सबक है। बड़े निवेश की घोषणा करना पहला कदम है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब फैक्ट्री तैयार होकर नियमित और बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करेगी। यही वजह है कि भारत में चिप की कहानी को सिर्फ निवेश के आंकड़ों से नहीं देखा जा सकता। असली सवाल यह है कि कितनी परियोजनाएं समय पर तैयार होती हैं और उनमें से कितनी बाजार के आधार पर लगातार अच्छी गुणवत्ता की चिप बना पाती हैं।
माइक्रोन ने उत्पादन शुरू किया
भारत में चिप की पैकिंग और जांच के क्षेत्र में माइक्रोन की गुजरात स्थित इकाई महत्वपूर्ण है। सरकार के मुताबिक सेमीकॉन 1.0 के तहत कुछ परियोजनाओं में अब वाणिज्यिक उत्पादन शुरू हो चुका है और भारत अब सिर्फ योजना बनाने के चरण में नहीं है।
लेकिन यहां एक जरूरी अंतर है। चिप बनाना और चिप की पैकिंग करना एक ही काम नहीं है। चिप बनाने में सिलिकॉन वेफर पर इलेक्ट्रॉनिक परिपथ (Electric Circuit) तैयार किए जाते हैं। इसके बाद उस चिप को इस्तेमाल लायक बनाने के लिए उसकी पैकिंग और जांच होती है। भारत ने पैकिंग के क्षेत्र में तेजी दिखाई है, लेकिन बड़े पैमाने पर अत्याधुनिक चिप निर्माण की क्षमता खड़ी करना अभी भी अगला बड़ा कदम है।
टाटा और फुजीफिल्म का समझौता
17 सितंबर को टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और जापान की फुजीफिल्म ने सेमीकंडक्टर सामग्री के लिए एक समझौता किया। फुजीफिल्म गुजरात में चरणबद्ध तरीके से करीब 800 करोड़ रुपये निवेश करके चिप उद्योग में इस्तेमाल होने वाली उच्च शुद्धता वाली रासायनिक सामग्री बनाने की योजना पर काम करेगी। यह सामग्री टाटा की धोलेरा परियोजना समेत भारत में बन रहे सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए जरूरी होगी।
पहली नजर में यह खबर चिप बनाने वाली फैक्ट्री जितनी बड़ी नहीं लगती। लेकिन असली बात यहीं छिपी है। अगर चिप बनाने के लिए जरूरी हर रसायन, गैस, मशीन और सामग्री बाहर से मंगानी पड़े तो फैक्ट्री भारत में होने के बावजूद पूरी व्यवस्था दूसरे देशों पर निर्भर रहेगी। इसलिए चिप उद्योग की ताकत सिर्फ फैक्ट्री की संख्या से नहीं तय होती। उसके पीछे खड़ी पूरी आपूर्ति व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।
AI के दौर मे चिप
AI की दुनिया जितनी तेजी से बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से ताकतवर चिप की जरूरत भी बढ़ रही है। बड़े AI मॉडल को चलाने के लिए बहुत ज्यादा गणना क्षमता चाहिए। इसके लिए खास तरह के प्रोसेसर और स्मृति चिप की जरूरत पड़ती है। डेटा केंद्र, दूरसंचार, इलेक्ट्रिक वाहन और आधुनिक रक्षा प्रणालियां भी लगातार ज्यादा चिप पर निर्भर हो रही हैं।
भारत के लिए इसका मतलब यह है कि चिप उद्योग का बाजार सिर्फ विदेशों में नहीं है। देश के भीतर भी मोबाइल, कार, दूरसंचार उपकरण, डेटा केंद्र और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने वाली कंपनियों को आने वाले वर्षों में ज्यादा चिप चाहिए होगी। अगर इसका कुछ हिस्सा भारत में ही बनता है तो इससे घरेलू उद्योग को भी फायदा हो सकता है।
क्या भारत चिप के मामले में आत्मनिर्भर हो जाएगा?
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत ने निश्चित तौर पर पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में बड़ा कदम उठाया है। 12 परियोजनाओं को मंजूरी मिली है, पांच परियोजनाओं में वाणिज्यिक उत्पादन शुरू होने की बात सरकार कह रही है और सेमीकॉन 2.0 के लिए 1,27,500 करोड़ रुपये की योजना सामने है। लेकिन बड़े पैमाने पर चिप निर्माण का अनुभव और क्षमता बनाने में समय लगता है।
इसलिए अगले दो-तीन साल बहुत महत्वपूर्ण होंगे। इस दौरान देखना होगा कि आज जिन निवेश प्रस्तावों की बात हो रही है, उनमें से कितने वास्तव में परियोजनाओं में बदलते हैं। कितनी फैक्ट्रियां समय पर बनती हैं। कितना उत्पादन शुरू होता है। और सबसे जरूरी-क्या भारत की बनी चिपें दुनिया की आपूर्ति व्यवस्था में लगातार अपनी जगह बना पाती हैं।
SEMICON India 2026 में असली दांव क्या?
असली दांव सिर्फ चिप बनाने की एक-दो फैक्ट्रियां खड़ी करने का नहीं है। भारत यह कोशिश कर रहा है कि चिप की पूरी कहानी में उसकी भूमिका हो। डिजाइन से शुरुआत हो, निर्माण तक पहुंचे, फिर पैकिंग और जांच हो, जरूरी मशीन और सामग्री देश में तैयार हो और शोध तथा कुशल लोगों की व्यवस्था भी साथ-साथ बढ़े। अगर यह व्यवस्था बनती है तो इसका असर सिर्फ सेमीकंडक्टर उद्योग पर नहीं पड़ेगा। इलेक्ट्रॉनिक्स, वाहन, दूरसंचार, AI, डेटा केंद्र और रक्षा जैसे कई क्षेत्र इससे जुड़े हैं। लेकिन इसके लिए घोषणाओं को जमीन पर उतारना होगा।
यही SEMICON India 2026 की असली परीक्षा है। भारत ने चिप की दौड़ में कदम रख दिया है। अब सवाल यह नहीं है कि भारत चिप बनाएगा या नहीं। सवाल यह है कि भारत इस दौड़ में कितनी दूर तक जा पाएगा और दुनिया की चिप आपूर्ति व्यवस्था में अपनी जगह कितनी मजबूत बना पाएगा।