H-1B पर ट्रम्प का नया दांव: $1 लाख की शर्त 2027 तक, भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए कितना बदला रास्ता?
अमेरिका ने नए H-1B आवेदकों पर 1 लाख डॉलर भुगतान बढ़ाया, वेतन-आधारित चयन और छंटनी की जांच से भारतीय IT प्रोफेशनल्स पर असर बढ़ सकता है।
संपादकीय सार (मुख्य बिंदु)Key Facts
- १.ट्रम्प प्रशासन ने कुछ नए H-1B आवेदकों के लिए $100,000 का भुगतान 21 सितंबर 2027 तक बढ़ाया है।
- २.यह फीस नियोक्ता को देनी होगी, न कि सीधे कर्मचारी को, और यह अमेरिका से बाहर के नए आवेदकों पर लागू है।
- ३.नई चयन प्रणाली में वेतन स्तर (wage level) को अधिक महत्व दिया जाएगा, जिससे उच्च वेतन वाले पदों को प्राथमिकता मिलेगी।
- ४.अमेरिकी प्रशासन अब H-1B आवेदनों की जांच करते समय कंपनियों की पिछली या प्रस्तावित छंटनी पर भी विचार करेगा।
- ५.H-1B वीजा के 71% लाभार्थी भारत में जन्मे हैं, इसलिए इन बदलावों का भारतीय प्रोफेशनल्स पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ेगा।

अमेरिका में नौकरी करने का सपना देखने वाले भारतीय IT और STEM प्रोफेशनल्स के लिए 18 सितंबर 2026 को H-1B वीजा को लेकर एक और बड़ा बदलाव सामने आया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने कुछ नए H-1B कर्मचारियों पर लागू $100,000 भुगतान को अगले 12 महीने के लिए बढ़ा दिया है। नई अवधि 21 सितंबर 2027 तक रहेगी। यह नियम खास तौर पर उन H-1B आवेदक पर लागू है जो अमेरिका से बाहर हैं और नए H-1B के आधार पर अमेरिका में प्रवेश करना चाहते हैं।
$1 लाख की फीस आखिर किस पर?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि $100,000 हर H-1B कर्मचारी को अपनी जेब से देने वाली सालाना फीस नहीं है। मौजूदा व्यवस्था में अमेरिका के बाहर मौजूद कुछ नए H-1B कर्मचारियों के लिए उनके नियोक्ता को याचिका के साथ भुगतान करना होता है। सरकार ने राष्ट्रीय-हित के आधार पर कुछ अपवाद का प्रावधान भी रखा है। अमेरिका में पहले से मौजूद H-1B कर्मचारियों पर इसका असर उसी तरह नहीं पड़ता।
इसका सीधा मतलब है कि अमेरिकी कंपनी अगर विदेश से किसी नए H-1B प्रोफेशनल को बुलाना चाहती है, तो उसकी भर्ती कि कीमत बहुत बढ़ सकती है। यही वजह है कि यह फैसला खास तौर पर IT आउटसोर्सिंग और टेक्नोलॉजी कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है।
मामला सिर्फ फीस तक सीमित नहीं
H-1B व्यवस्था में एक और बड़ा बदलाव चयन प्रक्रिया का है। नए weighted selection system में wage level के आधार पर उम्मीदवारों को अलग-अलग weight मिलता है। Federal Register के अनुसार, wage level IV को चार अवसर, level III को तीन, level II को दो और level I को एक अवसर दिया जाता है। यानी चयन अभी भी random element रखता है, लेकिन ज्यादा वेतन वाले पदों को अधिक बल मिलता है।
इस बदलाव से H-1B प्रक्रिया का फोकस केवल “कितने आवेदक हैं” से आगे बढ़कर किस तरह की नौकरी और किस wage level पर भर्ती हो रही है, इस पर भी जाता है।
सरकार अब कंपनियों की छंटनी भी देखेगी
18 सितंबर को जारी एक Executive Order में अमेरिकी प्रशासन ने H-1B आवेदनो की जांच के दौरान sponsoring employer के पिछले या प्रस्तावित layoffs को भी ध्यान में रखने का निर्देश दिया है। यानी अगर किसी कंपनी ने समान काम करने वाले अमेरिकी कर्मचारियों को हाल में हटाया है या भविष्य में ऐसी योजना है, तो उसकी H-1B आवेदन पर अतिरिक्त समीक्षा हो सकती है। श्रम विभाग को पुराने श्रम शर्त आवेदन के आंकड़े की समीक्षा करने का भी निर्देश दिया गया है।
White House का कहना है कि इसका उद्देश्य H-1B programme में कथित दुरुपयोग को रोकना और अमेरिकी कामगारों के रोजगार तथा वेतन की रक्षा करना है। दूसरी तरफ, H-1B programme के समर्थकों का तर्क रहा है कि अमेरिकी कंपनियों को कई कुशल क्षेत्रों में अन्तराष्ट्रिया प्रतिभाओं की जरूरत होती है।
$100,000 के भुगतान पर अदालत में भी मामला
इस पूरी व्यवस्था की कानूनी स्थिति भी महत्वपूर्ण है। जुलाई 2026 में एक अमेरिकी अपील कोर्ट ने ट्रम्प प्रशासन की उस कोशिश को रोक दिया था जिसमें वह $100,000 H-1B शुल्क को लागू करने के खिलाफ निचली अदालत के आदेश पर रोक चाहता था। सितंबर में भी इस शुल्क को लेकर कानूनी लड़ाई जारी रही। Reuters के अनुसार बोस्टन अपील कोर्ट इस मामले की समीक्षा कर रहा है।
इसलिए प्रशासन द्वारा इसे सितंबर 2027 तक बढ़ा देने का मतलब यह नहीं है कि इसकी कानूनी स्थिति हमेशा के लिए तय हो गई है। आने वाले अदालत के फैसले इसका वास्तविक भविष्य तय करने में अहम होंगे।
भारतीयों पर असर क्यों ज्यादा?
भारत के लिए H-1B का महत्व आंकड़ों से समझा जा सकता है। USCIS की FY2024 रिपोर्ट के अनुसार, approved H-1B petitions में 71% लाभार्थी भारत में जन्मे थे। चीन दूसरे स्थान पर था, लेकिन उसकी हिस्सेदारी करीब 12% थी।
यानी अमेरिका के H-1B नियमों में बदलाव का असर भारतीय टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल्स पर विशेष रूप से पड़ सकता है। खासकर वे लोग जो भारत से सीधे अमेरिका में नई नौकरी के लिए जाना चाहते हैं, उनके लिए कर्मचारियों की लागत और भर्ती प्रक्रिया दोनों महत्वपूर्ण हो गए हैं।
कंपनियों की रणनीति भी बदल सकती है
नई फीस, वेतन-भारित चयन और बढ़ी हुई जांच-परख का असर सिर्फ कर्मचारियों पर नहीं, बल्कि कंपनियों की भर्ती रणनीति पर भी पड़ सकता है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों ने अमेरिका के बाहर अपने संचालन और भर्ती को बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं।
यह बदलाव भारत के लिए दो तरह से देखा जा सकता है। एक तरफ अमेरिकी H-1B भर्ती महंगी होने से भारतीय पेशेवरों के लिए अमेरिका जाना कठिन हो सकता है। दूसरी तरफ अमेरिकी कंपनियां अगर भारत में ज्यादा टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग जॉब्स बनाती हैं, तो भारत में ही उच्च-कुशल रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। इसका वास्तविक प्रभाव आने वाले वर्षों में कंपनियों के फैसलों पर निर्भर करेगा।
तो भारतीय H-1B आवेदकों के लिए अब तस्वीर क्या है?
अभी H-1B की कहानी को केवल “$1 लाख की फीस” तक सीमित करना सही नहीं होगा। पिछले एक साल में व्यवस्था में कई स्तरों पर बदलाव हुए हैं—नई भुगतान आवश्यकता, वेतन-आधारित चयन और employer layoffs की अतिरिक्त जांच। इन बदलावों का साझा प्रभाव यह है कि अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशी H-1B भर्ती पहले की तुलना में अधिक महंगी और अधिक समीक्षा वाली प्रक्रिया बन रही है।
फिर भी मौजूदा H-1B धारक और नए विदेशी आवेदक की स्थिति एक जैसी नहीं है। इसलिए किसी भारतीय पेशेवर के लिए असर इस बात पर निर्भर करेगा कि वह पहले से अमेरिका में है या भारत से नया H-1B लेकर जा रहा है, उसका नियोक्ता कौन है, पद का वेतन स्तर क्या है और आने वाले अदालत के फैसले क्या होते हैं।
