रूस और यूरोप के बीच बढ़ता तनाव: क्या अगली जंग NATO की सीमा पर हो सकती है?
यूरोप में रूस को लेकर चिंता बढ़ी है। ब्रिटेन, पोलैंड, फ्रांस और स्विट्जरलैंड ने संभावित सैन्य या हाइब्रिड हमलों की चेतावनी दी है। हालांकि रूस ने यूरोप पर हमले की योजना से इनकार किया है। सवाल यह है कि खतरा कितना वास्तविक है और तनाव कितना बढ़ सकता है।
संपादकीय सार (मुख्य बिंदु)Key Facts
- १.ब्रिटेन, पोलैंड, फ्रांस और स्विट्जरलैंड ने रूस से संभावित सैन्य या हाइब्रिड हमलों की चेतावनी दी है।
- २.रूस ने यूरोप पर हमला करने की किसी भी योजना से इनकार किया है, लेकिन यूरोपीय देश उसकी गतिविधियों को लेकर चिंतित हैं।
- ३.हाइब्रिड युद्ध में साइबर हमले, गलत सूचना और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को बाधित करना शामिल है।
- ४.NATO के पूर्वी हिस्से में ड्रोन और एयरस्पेस से जुड़ी घटनाएं हुई हैं, जिससे गलत अनुमान का खतरा बढ़ गया है।
- ५.यूरोप में रूस को लेकर सुरक्षा चिंताएं वास्तविक हैं, लेकिन यह बड़े पैमाने पर हमले की पुष्टि नहीं करता।

रूस-यूक्रेन युद्ध का सबसे बड़ा खतरा सिर्फ यूक्रेन के मोर्चे तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ समय से यूरोप के सामने एक अलग तरह की चिंता उभर रही है। सवाल यह है कि अगर रूस और किसी NATO देश के बीच सीधा टकराव नहीं भी होता, तो क्या ड्रोन, साइबर हमले या एयरस्पेस से जुड़ी कोई घटना दोनों पक्षों को ऐसी स्थिति में पहुंचा सकती है जहां पीछे हटना मुश्किल हो जाए?
सितंबर में ब्रिटेन, पोलैंड, फ्रांस और स्विट्जरलैंड की ओर से आई सुरक्षा संबंधी चेतावनियों ने इस बहस को फिर तेज किया है। इन देशों के बयान अलग-अलग परिस्थितियों में आए, लेकिन उनमें एक साझा चिंता दिखाई देती है: रूस से जुड़ा खतरा अब केवल पारंपरिक युद्ध के रूप में नहीं देखा जा रहा।
ब्रिटेन में 16 सितंबर को वरिष्ठ सैन्य कमांडर जॉबी रिमर ने रूस से पैदा होने वाले खतरे के यूक्रेन से बाहर फैलने की आशंका जताई। इसके बाद पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने संसद में रूस की संभावित हाइब्रिड कार्रवाई को लेकर चिंता जाहिर की। उनके मुताबिक अमेरिका, यूक्रेन और NATO की खुफिया सूचनाओं से ऐसे खतरे के संकेत मिले हैं जिनमें किसी ड्रोन या दूसरे प्रोजेक्टाइल के जरिए NATO के किसी देश की सीमा को परखा जा सकता है।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी 18 सितंबर को इसी तरह की चिंता जताई। उनके बयान का केंद्र यह था कि रूस के साथ संभावित टकराव जरूरी नहीं कि पारंपरिक सैन्य हमले के रूप में ही सामने आए। उसी दिन स्विट्जरलैंड ने भी बदलते अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा माहौल का हवाला देते हुए अपनी रक्षा क्षमता मजबूत करने की जरूरत बताई।
यहां से असली सवाल शुरू होता है। क्या यूरोप जिन खतरों की बात कर रहा है, वे किसी बड़े रूसी हमले की तैयारी के संकेत हैं या फिर यूरोप उन घटनाओं को लेकर सतर्क हो रहा है जिनसे किसी दिन गंभीर सैन्य संकट पैदा हो सकता है?
दोनों स्थितियों के बीच बड़ा अंतर है।
रूस ने यूरोप पर हमला करने की किसी योजना से इनकार किया है। 8 सितंबर को डोनाल्ड ट्रंप और व्लादिमीर पुतिन के बीच बातचीत के दौरान भी पुतिन ने यूरोप पर हमला करने का इरादा नहीं होने की बात दोहराई थी।
लेकिन यूरोप की चिंता केवल पुतिन के सार्वजनिक बयानों पर आधारित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में NATO के पूर्वी हिस्से में ड्रोन और एयरस्पेस से जुड़ी घटनाएं हुई हैं। कई यूरोपीय देशों ने इन घटनाओं के लिए रूस को जिम्मेदार बताया, जबकि मॉस्को ने आरोपों को खारिज किया।
यहीं हाइब्रिड वॉरफेयर की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है।
किसी देश पर हमला करने के लिए सेना की सीमा पार करना ही एकमात्र तरीका नहीं है। सरकारी नेटवर्क पर साइबर हमला, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को बाधित करना, गलत सूचना फैलाना या किसी देश की राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करने की कोशिश भी सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए गंभीर खतरा मानी जाती है।
यूरोपीय देशों का आरोप है कि रूस से जुड़ी गतिविधियों में इस तरह के तरीके पहले भी दिखाई दिए हैं। इसके अलावा मोल्दोवा, रोमानिया, लातविया, पोलैंड और लिथुआनिया जैसे देशों ने अलग-अलग मौकों पर मिसाइलों या ड्रोन के अपने एयरस्पेस में पहुंचने की घटनाओं की जानकारी दी है।
इन घटनाओं का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि कोई ड्रोन सीमा के अंदर आ गया। समस्या यह है कि ऐसी स्थिति में दूसरे देश को कुछ ही मिनटों में तय करना पड़ सकता है कि सामने आई वस्तु दुर्घटना का परिणाम है या जानबूझकर की गई सैन्य कार्रवाई।
गलत फैसला यहां सबसे बड़ा जोखिम बन सकता है।
अगर किसी NATO देश को लगता है कि उसकी सीमा को जानबूझकर निशाना बनाया गया है और वह जवाब देता है, तो रूस भी उस कार्रवाई का जवाब दे सकता है। इस तरह एक छोटी घटना तेजी से बड़े टकराव में बदल सकती है।
इसी वजह से NATO की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठते हैं। रूस अगर किसी NATO देश के खिलाफ सीमित कार्रवाई करता है तो गठबंधन की प्रतिक्रिया कैसी होगी, यह सिर्फ सैन्य सवाल नहीं है। इसमें अमेरिका की भूमिका भी निर्णायक होगी।
और यहीं मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां इस बहस को और जटिल बनाती हैं।
अमेरिका पहले से दूसरे सैन्य और भू-राजनीतिक संकटों में उलझा हुआ है। यूरोपीय देशों के लिए यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि अगर रूस के साथ किसी नए टकराव की स्थिति पैदा होती है तो वॉशिंगटन किस स्तर तक इसमें शामिल होगा।
लेकिन रूस के नजरिए से तस्वीर अलग हो सकती है।
रूसी पक्ष का तर्क है कि वह पहले से यूक्रेन में बड़े युद्ध का सामना कर रहा है। इसी दौरान रूस के ऊर्जा ढांचे पर भी ड्रोन हमलों की खबरें आती रही हैं। ऐसे में NATO के साथ सीधे संघर्ष का नया मोर्चा खोलना उसके लिए बेहद बड़ा जोखिम होगा।
यानी एक तरफ यूरोप को डर है कि रूस उसकी सुरक्षा व्यवस्था की सीमाएं परख सकता है। दूसरी तरफ रूस का दावा है कि यूरोप पर हमला करने का उसका कोई इरादा नहीं है।
इस विरोधाभास को समझने के लिए रूस और NATO के बीच पुराने विवाद को देखना जरूरी है।
पूर्वी यूरोप में NATO का विस्तार रूस की लंबे समय से चली आ रही सुरक्षा चिंताओं का हिस्सा रहा है। रूस का कहना है कि NATO के विस्तार से पश्चिमी सैन्य ढांचा उसकी सीमाओं के करीब पहुंचा है। यूक्रेन के NATO से संभावित जुड़ाव ने इस तनाव को और बढ़ाया।
पश्चिमी देशों का तर्क इसके विपरीत है। उनके मुताबिक NATO में शामिल होना संबंधित देशों का संप्रभु निर्णय है और रूस को यह तय करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि उसके पड़ोसी किस सुरक्षा गठबंधन का हिस्सा बनें।
यही विवाद आज के रूस-NATO तनाव की बुनियादी वजहों में से एक है।
फिर भी केवल सुरक्षा नीति से मौजूदा यूरोपीय बयानबाजी को पूरी तरह समझना मुश्किल है। यूरोप के कई देशों में रूस, NATO और राष्ट्रीय सुरक्षा पहले से ही घरेलू राजनीतिक बहस का हिस्सा हैं। पोलैंड और फ्रांस में 2027 में चुनाव होने हैं और जर्मनी में भी रूस के साथ संबंधों को लेकर राजनीतिक मतभेद हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि रूस से जुड़े हर सुरक्षा अलर्ट को घरेलू राजनीति का परिणाम माना जाए। यूरोपीय सरकारों के पास ऐसी खुफिया जानकारी हो सकती है जिसे सार्वजनिक नहीं किया गया है। बाहर से उपलब्ध बयानों के आधार पर उस जानकारी की वास्तविक प्रकृति तय करना संभव नहीं है।
इसलिए फिलहाल सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यह है कि यूरोप में रूस को लेकर सुरक्षा चिंता वास्तविक रूप से बढ़ी है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि रूस ने यूरोप पर बड़े पैमाने पर हमला करने का फैसला कर लिया है।
असल खतरा शायद किसी घोषित युद्ध योजना से ज्यादा गलत अनुमान और अनियंत्रित escalation का है।
यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस और पश्चिम के बीच सैन्य दूरी लगातार कम हुई है। ड्रोन सीमाओं के पार पहुंच रहे हैं, एयरस्पेस उल्लंघन के आरोप लग रहे हैं और हाइब्रिड हमलों को लेकर दोनों पक्षों के बीच अविश्वास बढ़ रहा है। ऐसे माहौल में किसी एक घटना की गलत व्याख्या भी बड़ी समस्या पैदा कर सकती है।
इसलिए यूरोप के सामने फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि रूस अगला हमला कब करेगा। सवाल यह है कि अगर अगली संदिग्ध सैन्य घटना NATO की सीमा पर होती है, तो उसे दुर्घटना, उकसावे या वास्तविक हमले के रूप में कौन और कितनी जल्दी तय करेगा।
क्योंकि रूस और यूरोप के बीच मौजूदा तनाव में शायद सबसे खतरनाक चीज कोई एक मिसाइल नहीं, बल्कि उस मिसाइल को लेकर गलत फैसला हो सकता है।
