ट्रम्प के हाथ लगा टैरिफ का हंटर, 100% तक टैरिफ का नियम पारित

16 सितंबर 2026 को अमेरिकी संसद में पारित हुआ कानून, रूसी तेल खरीदारों पर लग सकेगा 100% तक टैरिफ

संपादकीय सार (मुख्य बिंदु)Key Facts

  • १.अमेरिकी संसद ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का विधेयक पारित किया है।
  • २.यह विधेयक राष्ट्रपति ट्रंप को रूस के ऊर्जा खरीदारों पर आर्थिक दबाव बनाने की शक्ति देता है।
  • ३.भारत, रूस से कच्चे तेल का एक प्रमुख आयातक है और इस विधेयक के संभावित दायरे में आ सकता है।
  • ४.भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्धता जताई है।
  • ५.विधेयक का उद्देश्य रूस की तेल से होने वाली कमाई को कम करना और यूक्रेन युद्ध पर दबाव बढ़ाना है।
ट्रम्प के हाथ लगा टैरिफ का हंटर, 100% तक टैरिफ का नियम पारित
तस्वीर साभार: संपादकीय अपलोड

अमेरिकी संसद ने रूस पर नए और कड़े सैंक्शंस लगाने वाला एक बड़ा विधेयक पास कर दिया है। 16 सितंबर 2026 को House of Representatives ने Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 को 262-159 वोट से मंजूरी दी। इससे पहले Senate इसे 7 अगस्त को 86-11 वोट से पास कर चुका था। अब यह विधेयक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास है। इसके कानून बनने के बाद ट्रंप को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले कुछ देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की ताकत मिल सकती है। भारत और चीन इस प्रावधान के दायरे में आ सकते हैं।

लेकिन यहां सबसे पहले एक बात साफ कर देना जरूरी है। भारत पर अभी 100% टैरिफ लगा नहीं है। विधेयक में राष्ट्रपति को अधिकतम 100% तक टैरिफ लगाने की ताकत देने का प्रावधान है। इसका इस्तेमाल कब होगा, भारत पर होगा या नहीं होगा, कितना होगा और किन सामानों पर होगा—इन सवालों का जवाब आगे अमेरिकी प्रशासन के फैसले से मिलेगा। इसलिए इस खबर को “भारत पर 100% टैरिफ लग गया” कहना अभी सही नहीं होगा।


अमेरिका ने यह विधेयक क्यों पास किया?

इस पूरी कहानी के केंद्र में रूस-यूक्रेन युद्ध है। अमेरिका और उसके सहयोगी देश लंबे समय से रूस की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि रूस की युद्ध से जुड़ी कमाई कम हो और रूस पर यूक्रेन में युद्ध खत्म करने के लिए दबाव बढ़े। लेकिन एक समस्या है। पश्चिमी देशों की पाबंदियों के बावजूद रूस ने अपना तेल भारत, चीन और दूसरे देशों को बेचना जारी रखा है। यानी पश्चिमी बाजार बंद होने के बाद भी रूस के पास बड़े खरीदार मौजूद रहे।

अमेरिका की नई रणनीति इसी जगह से शुरू होती है। Washington अब सिर्फ रूस पर दबाव नहीं बनाना चाहता, बल्कि उन बड़े देशों पर भी आर्थिक दबाव बनाने का रास्ता चाहता है जो रूस से ऊर्जा खरीद रहे हैं। Reuters के मुताबिक नए कानून का उद्देश्य रूस के ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र पर दबाव बढ़ाना और उसकी तेल से होने वाली कमाई को प्रभावित करना है। इसी कानून में रूस के बड़े energy buyers पर 100% तक टैरिफ लगाने की व्यवस्था भी रखी गई है।


भारत इस कहानी में इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

भारत रूस से कच्चे तेल के बड़े खरीदारों में है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूसी तेल भारत के लिए और महत्वपूर्ण हो गया, क्योंकि रूस कई बार अपने कच्चे तेल को दूसरे बाजारों की तुलना में छूट पर बेच रहा था। भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में है और अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा बाहर से खरीदता है। इसलिए भारतीय रिफाइनरियों के लिए जहां से पर्याप्त मात्रा में और प्रतिस्पर्धी कीमत पर कच्चा तेल  मिल सकता है, वहां से खरीद करना कारोबार का अहम हिस्सा है।

यही बात अमेरिका और भारत के नजरिए में फर्क पैदा करती है। Washington के लिए रूसी तेल की बिक्री का मतलब है रूस को मिलने वाला पैसा, जबकि भारत के लिए रूस से व्यापार ऊर्जा सुरक्षा और refinery economics का हिस्सा है। अमेरिका चाहता है कि रूस की तेल से होने वाली कमाई घटे; भारत चाहता है कि उसके पास अपनी जरूरत के मुताबिक तेल खरीदने के पर्याप्त विकल्प बने रहें। दोनों देशों की प्राथमिकताएं यहां पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं।


ट्रंप ने भारत पर पहले भी दबाव बनाया है

यह पहली बार नहीं है जब ट्रम्प प्रशासन ने भारत की रूसी तेल खरीद को टैरीफ नीति से जोड़ा है। 2025 में अमेरिका ने भारत से आने वाले सामान पर अतिरिक्त 25% टैरिफ लगाया था और इसके पीछे भारत की रूसी तेल खरीद को भी वजहों में शामिल किया गया था। बाद में फरवरी 2026 में अमेरिका ने उस अतिरिक्त 25% टैरिफ को हटा दिया था। इससे यह साफ होता है कि ट्रम्प  प्रशासन पहले से ही टैरीफ  को रूस नीति के साथ जोड़कर इस्तेमाल कर रही है।

इस बार फर्क यह है कि मामला केवल भारत के लिए लगाए गए किसी अलग टैरीफ तक सीमित नहीं है। अमेरिकी संसद ने राष्ट्रपति को एक व्यापक कानूनी रास्ता दिया है, जिसके जरिए रूस के बड़े energy buyers पर भी दबाव बनाया जा सकता है। यही वजह है कि इस कानून  को भारत के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


रूस पर सीधे दबाव काफी क्यों नहीं पड़ रहा?

यहां वैश्विक ऊर्जा बाजार की कहानी समझनी होगी। रूस दुनिया के बड़े कच्चे तेल का निर्यातकों में है। अमेरिका और उसके सहयोगी देश रूसी तेल पर अपने यहाँ प्रतिबंध लगाते हैं, लेकिन भारत और चीन जैसे बड़े खरीदार उसे खरीदते रहते हैं, तो रूस अपने तेल को दूसरे बाजारों में भेज सकता है। यही वजह है कि अमेरिका की कोशिश अब सिर्फ रूसी निर्यातकों को  निशाना बनाने की ही नहीं है बल्कि खरीदारों को भी यह संकेत देने की है कि रूस से ऊर्जा संसाधन खरीदने की कीमत चुकानी पड़ सकती है।

इस व्यवस्था को आसान भाषा में ऐसे समझिए—अमेरिका रूस से कह रहा है कि हम तुम्हारी कमाई पर दबाव डालेंगे, लेकिन साथ ही उन देशों को भी आर्थिक जोखिम उठाने पड़ेंगे जो तुम्हारे तेल के बड़े खरीदार हैं। अमेरिकी सांसदों के बीच इस दृष्टिकोण का समर्थन करने वालों का तर्क है कि इससे रूस की तेल से होने वाली कमाई घट सकती है और रूस पर युद्ध खत्म करने का दबाव बढ़ सकता है।


लेकिन अमेरिका के सामने खुद भी एक मुश्किल है

रूस पर बहुत ज्यादा दबाव डालने का एक जोखिम वैश्विक तेल कीमतों से जुड़ा है। अगर रूसी  कच्छे तेल  की बड़ी मात्रा बाजार से बाहर हो जाती है तो दुनिया में तेल की आपूर्ति घट सकती है और कीमत बढ़ सकती है। इसका असर भारत जैसे बड़े आयातकों पर तो पड़ेगा ही, अमेरिका और उसके सहयोगियों पर भी पड़ेगा। इसलिए वॉशिंगटन के लिए यह सिर्फ राजनीतिक फैसला नहीं है। उसे यह भी देखना होगा कि रूस  पर दबाव बढ़ाते हुए वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में कितना बड़ा भूचाल आता है।

यही वजह है कि कानून में राष्ट्रपति को सीधे हर देश पर 100% टैरीफ लगाने के बजाय अधिकतम 100% तक टैरीफ लगाने की ताकत दी गई है। यानी 100% एक सीमा है, ऑटोमैटिक रेट नहीं है  है कि आगे अमेरिकी प्रशासन यह तय करेगा कि किस देश पर कितनी दर लागू करनी है और किन परिस्थितियों में इसे कम करना है या हटाया जाना है।


अमेरिकी संसद में किसने वोट दिया?

अमरीकी संसद के निचले सदन (House of Representatives) में विधेयक 262-159 मतदान से पास हुआ। 203 Republicans (ट्रम्प के धड़े वाले सांसद) ने इसके पक्ष में मतदान किया, जबकि 7 Republicans ने विरोध किया। Democrats में 58 ने पक्ष में और 152 ने विरोध में मतदान दिया। एक नर्दलीय सांसद ने भी पक्ष में मतदान किया। यानी विधेयक सिर्फ Republican Party के समर्थन से पास नहीं हुआ; 58 Democrats ने भी इसका समर्थन किया।

विरोध की एक बड़ी वजह रूस पर कार्रवाई नहीं, बल्कि राष्ट्रपति को दी जा रही व्यापक टैरीफ शक्ति थी। कुछ Democrats को चिंता थी कि रूस पर दबाव बनाने के नाम पर राष्ट्रपति को दूसरे देशों के खिलाफ बहुत बड़ी टैरीफ शक्ति मिल जाएगी और इसका असर अमेरिकी कंपनियों और ग्राहकों तक पहुंच सकता है। दूसरी तरफ विधेयक के समर्थकों का तर्क था कि रूस पर प्रभावी दबाव बनाने के लिए राष्ट्रपति के पास ऐसा आर्थिक हथियार होना जरूरी है।


भारतीय मूल के सांसदों ने क्या किया?

इस मतदान का सबसे दिलचस्प हिस्सा अमेरिकी House के छह  भारतीय- अमरीकी सांसदों का voting pattern है। इन छह में सिर्फ राजा कृष्णामूर्ति ने विधेयक के पक्ष में वोट किया। बाकी पांच - रोहित खन्ना, प्रमिला जयपाल , अमरीश बाबूलाल या एमी बेरा, श्री थानेदार और सुहास सुब्रमण्यम - ने इसके खिलाफ वोट किया। यानीभारतीय- अमरीकी सांसदों  में 1 पक्ष में और 5 विपक्ष में रहे।

लेकिन इन मतों को सिर्फ भारत के रूसी तेल खरीदने के नजरिए से देखना ठीक नहीं होगा। सभी छह भारतीय मूल के सांसद Democrats हैं और House में Democrats के बड़े हिस्से ने विधेयक का विरोध किया था। इसलिए किसी सांसद के “हाँ” या “ना” मतदान से यह सीधे निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह भारत की रूसी तेल नीति का समर्थन या विरोध कर रहा था। मतों पूरे विधेयक पर था, जिसमें रूस  और ईरान से जुड़े कई अलग-अलग प्रावधान शामिल थे।

राजा कृष्णामूर्ति का रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर सार्वजनिक रुख भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। उन्होंने यूक्रेन के समर्थन में सार्वजनिक रूप से अपनी रुख दिखाया है। इसलिए उनके मतदान को रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर उनकी विदेश नीति के व्यापक रुख के संदर्भ में देखा जा सकता है, लेकिन सिर्फ इस मतदान के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि उन्होंने “भारत पर 100% टैरिफ” का समर्थन किया।


भारत ने क्या कहा?

भारत ने 17 सितंबर को अमेरिकी कदम पर अपनी प्रतिक्रिया दी। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत अपनी 1.4 अरब आबादी की ऊर्जा सुरक्षा  सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और बदलते हुए बाज़ार की परिस्थितियों के हिसाब से अलग-अलग   से ऊर्जा आयत करता रहेगा। मंत्रालय ने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर हाल के महीनों में अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर बातचीत हुई है और भारत ने द्विपक्षीय संबंध और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर संभावित असर को अमेरिकी पक्ष के सामने स्पष्ट रूप से रखा है।

भारत ने साथ ही कहा कि वह अपने व्यापारिक  और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा और सरकार इस मामले में भारतीय व्यापारिक और औद्योगिक संस्थानों के साथ मिलकर काम करेगी। यानी नई दिल्ली  ने फिलहाल न तो रूसी तेल खरीद बंद करने की घोषणा की है और न ही अमेरिकी कदम को स्वीकार करने की बात कही है। उसका सार्वजनिक रुख यह है कि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर आगे के फैसले लिए जाएंगे।


भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम क्या है?

अगर ट्रम्प  इस कानून का इस्तेमाल करते हैं और भारत पर ऊंचा टैरीफ लगाया जाता है, तो असर दो तरफ से आ सकता है। पहला असर भारत के अमेरिका को होने वाले आयातक पर पड़ सकता है। लेकिन इसका वास्तविक असर तभी पता चलेगा जब अमेरिकी प्रशासन टैरीफ की दर, किन उत्पादों  पर वह लागू होगा और उसकी शुरुआत कब से होगी, यह साफ करेगा। भारतीय निर्यातकों  के लिए फिलहाल सबसे बड़ी समस्या यही अनिश्चितता  है। 

दूसरी तरफ रूसी  कच्चे तेल  की खरीद कम करने का सवाल है। अगर भारतीय रिफ़ाइनरीयों को रूस से कम तेल लेना पड़ता है तो उन्हें दूसरे आपूर्तिकर्ताओं से कच्चा तेल खरीदना होगा। मध्य पूर्व , अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका (ब्राजील, मेक्सिको, वेनेजुएला, गयाना, कोलंबिया) से तेल खरीदा जा सकता है, लेकिन  कच्चे तेल की कीमत के साथमाल-भाड़ा, बीमा, गुणवत्ता और रिफायनरियों की जरुरतें भी मायने रखती हैं। इसलिए रूसी तेल को किसी दूसरे जगह से तुरंत और बिल्कुल उसी क़ीमत पर बदलना जरूरी नहीं कि आसान हो।


क्या भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा?

फिलहाल ऐसा कोई फैसला सामने नहीं आया है। भारत ने अपनी प्रतिक्रिया में ऊर्जा आयात में में बिविधता रखने की बात कही है। यानी भारत के लिए रास्ता सिर्फ “रूसी तेल खरीदना या पूरी तरह बंद करना” नहीं है। वह अलग-अलग आपूर्तिकर्ताओं  के बीच संतुलन बनाकर भी अपनी जरूरत पूरी कर सकता है।

आगे अगर अमेरिकी सरकार भारत पर टैरीफ का इस्तेमाल करती है, तो भारत के पास बातचीत का रास्ता भी रहेगा। भारत यह देख सकता है कि क्या उसे कोई छूट मिलती है, टैरीफ कम होता है या रूसी कच्चे तेल की खरीद में बदलाव के बदले कोई दूसरा व्यापारिक  समझौता बनता  है। अभी इन विकल्पों में से किसी को भी अंतिम नहीं माना जा सकता।


रूस ने इस पर क्या कहा?

रूस ने अमेरिकी कदम का विरोध किया है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि अगर ट्रम्प  नए सैंक्शंस को मंजूरी देते हैं तो इससे रूस-यूक्रेन शांति वार्ता और मुश्किल हो सकती हैं। रूस का तर्क है कि एक तरफ बातचीत की कोशिश और दूसरी तरफ नए आर्थिक दबाव दोनों को साथ चलाना मुश्किल है।

यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्रम्प  प्रशासन  की रूस नीति  में दो चीजें साथ दिखाई देती हैं—एक तरफ रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और दूसरी तरफ यूक्रेन युद्ध को खत्म करने के लिए बातचीत का रास्ता खुला रखना। नए सैंक्शंस इसी दबाव वाले हिस्से को मजबूत करते हैं।


आगे क्या होगा?

अब सबसे महत्वपूर्ण कदम ट्रम्प का होगा। House (अमेरिकी संसद का निचला सदन) और Senate (अमेरिकी संसद का ऊपरी सदन) दोनों से विधेयक पास हो चुका है, इसलिए अगला सवाल यह है कि राष्ट्रपति इसे कब कानून बनाते हैं और उसके बाद प्रशासन इस टैरीफ शक्ति का इस्तेमाल कैसे करता है। भारत के लिए असली स्थिति तब ज्यादा साफ होगी जब वॉशिंगटन यह बताएगा कि किन देशों को लक्षित किया जा रहा है, टैरीफ की दर क्या होगी और किन उत्पादों पर यह लागू होगा।

अगर भारत पर ऊंचा टैरीफ लगाया जाता है तो भारत-अमेरिका व्यापार पर दबाव बढ़ सकता है। अगर भारत रूसी तेल की खरीद घटाता है तो उसकी ऊर्जा रणनीति में बदलाव आ सकता है। और अगर कई बड़े खरीदार एक साथ रूसी तेल कि खरीद से पीछे हटते हैं तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए इस कहानी का असर सिर्फ भारत और अमेरिका तक सीमित नहीं है।

फिलहाल सबसे सटीक निष्कर्ष यही है कि अमेरिका ने भारत पर 100% टैरीफ नहीं लगाया है, बल्कि ट्रम्प  के लिए अमेरिकी संसद ने उसे लगाने का रास्ता खोला है। भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता बताते हुए अपने व्यापार और आर्थिक हित की रक्षा करने की बात कही है। अब आगे की कहानी वॉशिंगटन में लिए जाने वाले फैसले और भारत की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगी।